प्रयागराज, 22 जनवरी (khabarwala24)। प्रयागराज के संगम में चल रहे माघ मेले में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ हुए विवाद ने खलबली मचा दी है। अब इस मामले को लेकर उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ से महंत स्वामी अनंतानंद स्वामी और उत्तराखंड से स्वामी सर्वानंद ने मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी।
संगम घाट पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य और अधिकारियों के बीच हुए विवाद को लेकर स्वामी अनंतानंद सरस्वती ने कहा, “मेले और अब रास्ते में बैरियर लगा दिए गए हैं। अब सही या गलत तब साफ होगा, जब लोग वहां जाकर देखेंगे कि क्या हो रहा है। उन्होंने सड़क को रोक दिया है और वहीं बैठे हैं। अगर मैं जिम्मेदार होता तो केवल नोटिस नहीं देता बल्कि सीधे कार्रवाई करता।”
इसी के साथ ही स्वामी ने प्रशासन की सराहना करते हुए कहा कि वे अच्छे से काम कर रहे हैं। उन्होंने पिछले कुंभ मेले की रिपोर्ट का जिक्र किया और कहा कि कुछ लोग कहते हैं कि संगम नोज में ही स्नान का महत्व है। उन्होंने कहा, “ब्रह्मा का एक दिन पृथ्वी के 1 करोड़ दिनों के बराबर है।
उन्होंने दुख जताते हुए आगे कहा कि सरकारों द्वारा पोषित कुछ लोग ऐसे बयान देते हैं। उन्होंने ‘हिंदू आतंकवाद’ जैसे शब्दों का जिक्र कर पुरानी घटनाओं का हवाला दिया और पूछा कि उस समय अविमुक्तेश्वरानंद और उनके गुरुजी कहां थे जब हिंदुओं को आतंकवाद कहा जा रहा था। उन्होंने क्यों नहीं बोला कि हिंदू कभी आतंकवादी नहीं हो सकते?
इसी के साथ उत्तराखंड के ऋषिकेश से स्वामी सर्वानंद महाराज ने इस घटना पर गहरा दुख जताया। उन्होंने कहा, “रामभद्राचार्य महाराज इतने महान विद्वान हैं कि उन्होंने हमारे पूरे जीवन से भी ज्यादा समय ध्यान, चिंतन और साधना में बिताया है। वे कभी भावनाओं में आकर कोई बात नहीं कहेंगे। हम सभी उनके शब्दों का आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सम्मान करते हैं।”
स्वामी सर्वानंद ने आगे कहा कि प्राचीन काल से महान संत और ऋषि मां गंगा की पूजा और श्रद्धा करते आए हैं। उन्होंने कहा, “13 अखाड़ों के संत गंगा स्नान के लिए 50 से 100 फीट दूर से चलकर आते हैं। इस साल का माघ मेला दिल को दुख देने वाला और पीड़ा भरा रहा। शास्त्रों में माघ स्नान का विशेष महत्व है, खासकर कुंभ जैसे मेलों में शाही स्नान की परंपरा है।
इसी के साथ ही महंत ने साल 2025 कुंभ मेले की घटना को याद किया। उन्होंने कहा, “पिछली बार कुंभ मेले में साधु-संतों ने अभिमान त्यागकर पहले सर्व साधारण को स्नान करने दिया और बाद में खुद स्नान किया। यह साधु-संतों की महिमा है कि वे जनता, भारत और धर्म को प्राथमिकता देते हैं। इस बार जो हुआ, वह मन को बहुत पीड़ा देने वाला है। यदि प्रशासन साथ नहीं देता तो कुंभ जैसी भगदड़ हो सकती थी और कई जानें जा सकती थीं।”
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