नई दिल्ली, 6 दिसंबर (khabarwala24)। टाइप 1 डायबिटीज एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर लगभग पूरी तरह इंसुलिन बनाना बंद कर देता है। इंसुलिन के बिना ग्लूकोज कोशिकाओं में नहीं जाता और खून में जमा होने लगता है। यह बीमारी अक्सर बच्चों और किशोरों में दिखाई देती है।
इसे ऑटोइम्यून डिसऑर्डर कहा जाता है, यानी शरीर अपने ही पैंक्रियास की बीटा कोशिकाओं पर हमला कर देता है। धीरे-धीरे इंसुलिन का स्तर कम होता है और अंत में लगभग शून्य हो जाता है। कभी-कभी शुरुआत में थोड़ी इंसुलिन बनती रहती है।
इम्यून सिस्टम सामान्य परिस्थितियों में वायरस और बैक्टीरिया से सुरक्षा करता है, लेकिन टाइप 1 में यह गलती से बीटा कोशिकाओं को हानिकारक समझ लेता है। इसे ऑटोइम्यून अटैक कहते हैं। इस प्रक्रिया में इम्यून सेल्स धीरे-धीरे बीटा कोशिकाओं को खत्म करते हैं।
जेनेटिक प्रवृत्ति सबसे बड़ा कारण मानी जाती है। यदि परिवार में किसी को टाइप 1 है, तो रिस्क बढ़ जाता है। कुछ वायरल इंफेक्शन और बचपन के वायरस इम्यून सिस्टम को भ्रमित कर सकते हैं।
शुरुआती लक्षणों में बहुत प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, तेजी से वजन घटना, भूख अधिक लगना, त्वचा का रूखापन, थकान, मूड बदलना, घाव देर से भरना और धुंधली दृष्टि शामिल हैं। बच्चों में उल्टी और पेट दर्द भी हो सकते हैं।
पहचान के लिए फास्टिंग ब्लड शुगर, पीपीबीएस, एचबीए1सी और सी-पेप्टाइड टेस्ट किया जाता है। ऑटोएंटीबॉडी टेस्ट (जीएडी, आईए2, जेडएनटी8) टाइप 1 की पुष्टि करते हैं। डीकेए की स्थिति में ब्लड और यूरिन में कीटोन बढ़ जाते हैं।
आयुर्वेद इसे युवावस्थाजन्य मधुमेह और धातु-क्षयजन्य मानता है। ओज की कमी, अग्नि की कमजोरी और प्रतिरक्षा असंतुलन इसे जन्म देते हैं।
घरेलू उपाय में भोजन नियमित और हल्का रखें। गुनगुना पानी दें। ठंडी चीजें और पैकेज्ड फूड कम करें। हल्का योग और स्ट्रेचिंग कराएं। पर्याप्त नींद दें। आयुर्वेदिक सपोर्ट के लिए वासावलेह, अमलकी चूर्ण, गुड्डुची सत्व और शतावरी घृत जैसी औषधियां वैद्य की सलाह पर दी जा सकती हैं। याद रखें मुख्य उपचार इंसुलिन ही है। घरेलू उपाय केवल सहायक हैं।
Source : IANS
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