नई दिल्ली, 17 फरवरी (khabarwala24)। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें संवैधानिक अधिकारियों के उन बयानों और टिप्पणियों को नियंत्रित करने के लिए सख्त दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई थी, जो संवैधानिक मर्यादा के अनुरूप नहीं माने जाते।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि उठाया गया मुद्दा गंभीर है, लेकिन याचिका अपने मौजूदा रूप में कुछ खास व्यक्तियों को निशाना बनाती हुई प्रतीत होती है। अदालत ने यह भी कहा कि वह ऐसी किसी याचिका पर सुनवाई नहीं कर सकती जिससे यह लगे कि मामला किसी एक व्यक्ति या राजनीतिक दल के खिलाफ है।
याचिका में हिमंत बिस्वा सरमा, पुष्कर सिंह धामी, योगी आदित्यनाथ, और नितेश राणे सहित कुछ नेताओं के बयानों का उल्लेख किया गया था। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि उन्होंने शोध के दौरान करीब 30 आपत्तिजनक सार्वजनिक बयानों की पहचान की है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि इस मामले में तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत है। उन्होंने दलील दी कि स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है और अदालत को इस पर कुछ ठोस कदम उठाना चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका किसी एक व्यक्ति को निशाना बनाने के लिए नहीं है।
हालांकि, पीठ ने टिप्पणी की कि याचिका में कुछ लोगों का चयन किया गया है, जबकि अन्य को नजरअंदाज किया गया है, जो उचित नहीं है। अदालत ने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता मौजूदा याचिका वापस लेकर केवल संवैधानिक सिद्धांतों पर केंद्रित नई याचिका दाखिल करें और यह सुनिश्चित करें कि वह किसी विशेष व्यक्ति या दल के खिलाफ न लगे।
इस पीठ में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्या बागची भी शामिल थे। अदालत ने कहा कि राजनीतिक दलों और नेताओं की जिम्मेदारी है कि वे देश में भाईचारे को बढ़ावा दें और संवैधानिक मूल्यों का पालन करें। साथ ही, अदालत ने यह चिंता भी जताई कि यदि दिशा-निर्देश बना भी दिए जाएं तो क्या उनका सही तरीके से पालन हो पाएगा।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल किया, “भाषण देने से पहले मन में विचार आते हैं। हम विचारों को कैसे नियंत्रित कर सकते हैं?”
इस पर वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने जवाब दिया कि विचारों को नियंत्रित नहीं किया जा सकता, लेकिन उनके आधार पर किए गए कार्यों और उनके परिणामों को नियंत्रित किया जा सकता है। उन्होंने उदाहरण के तौर पर ‘विशाखा गाइडलाइंस’ का हवाला दिया, जो कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ कानून बनने से पहले तक लागू थीं।
सिब्बल ने यह भी कहा कि कई बार मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट लागू होने से पहले दिए गए भाषण चुनाव की घोषणा के बाद भी सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफॉर्म पर प्रसारित होते रहते हैं। ऐसे मामलों में निर्वाचन आयोग के लिए कार्रवाई करना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि बयान चुनाव की औपचारिक घोषणा से पहले दिए गए होते हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि ऐसी स्थितियों में मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के लिए दिशा-निर्देश बनाने पर विचार किया जाए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने माना कि याचिकाकर्ता प्रतिष्ठित लोग हैं और उनके द्वारा उठाया गया मुद्दा गंभीर है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत इस याचिका पर विचार करना चाहती है। लेकिन, वह चाहती है कि मामला बिना किसी पक्षपात के और निष्पक्ष तरीके से उसके सामने रखा जाए। उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि मौजूदा याचिका ठीक से तैयार नहीं की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई दो हफ्तों के लिए स्थगित कर दी, ताकि संशोधित याचिका दाखिल की जा सके। सिब्बल ने अदालत को भरोसा दिलाया कि नई याचिका में किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं होगा और वह सभी राजनीतिक दलों पर समान रूप से लागू होगी।
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