नई दिल्ली, 19 फरवरी (khabarwala24)। आज जब हम हिमाचल के सेब खाते हैं, मिजोरम के बांस के जंगलों की तस्वीरें देखते हैं, या अरुणाचल के तवांग मठ में शांति तलाशते हैं, तो हमें उन संघर्षों और समझौतों को याद रखना चाहिए, जिन्होंने इन राज्यों को जन्म दिया। इन राज्यों का गठन हमें बताता है कि भारत की ताकत उसकी विविधता को एक सूत्र में पिरोने में ही है।
आज कई बार लोग 1971 और 1987 की तारीखों में उलझ जाते हैं। क्या आप जानते हैं कि जिस साल (1987) को अक्सर हिमाचल के साथ जोड़ा जाता है, वह असल में भारत के सुदूर पूर्व (मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश) के उदय का साल था?
साल 1987 भारतीय संघवाद के इतिहास में ‘स्वर्णिम वर्ष’ माना जाता है। यह वह साल था, जब भारत के नक्शे पर दो नए राज्य, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश, जुड़े।
मिजोरम की कहानी किसी बॉलीवुड थ्रिलर से कम नहीं है। 1966 में एक अकाल के बाद वहां विद्रोह की आग भड़क उठी थी। लालडेंगा के नेतृत्व में ‘मिजो नेशनल फ्रंट’ (एमएनएफ) ने भारत से अलग होने के लिए हथियार उठा लिए थे। दो दशकों तक वहां बारूद की गंध और डर का माहौल रहा।
लेकिन, भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती देखिए, बातचीत के दरवाजे कभी बंद नहीं हुए। 1986 में एक ऐतिहासिक शांति समझौता हुआ। विद्रोही नेता लालडेंगा, जो कभी जंगल में छिपे रहते थे, वे मुख्यधारा में लौटे।
समझौते के तहत, 20 फरवरी 1987 को मिजोरम को भारत का 23वां राज्य घोषित किया गया। यह दुनिया के उन विरले उदाहरणों में से है, जहां एक विद्रोही आंदोलन पूरी तरह से शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बदल गया। लालडेंगा राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने।
मिजोरम के साथ ही, उसी दिन यानी 20 फरवरी 1987 को एक और इतिहास रचा जा रहा था। वह क्षेत्र जिसे कभी ‘नेफा’ (उत्तर-पूर्व सीमांत एजेंसी) कहा जाता था और जो चीन की सीमा पर भारत का प्रहरी बनकर खड़ा था, उसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिला।
अरुणाचल प्रदेश, यानी ‘उगते सूरज की भूमि’। सामरिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील इस क्षेत्र को भारत का 24वां राज्य बनाया गया। अरुणाचल का राज्य बनना एक संदेश था कि तवांग की घाटियों से लेकर लोहित नदी के तट तक बसने वाले लोग भारत के अटूट अंग हैं।
अगर हिमाचल प्रदेश की बात करें तो इसकी यात्रा भी दिलचस्प और जिक्र करने के लायक है। आजादी के तुरंत बाद, 1948 में 30 छोटी-बड़ी रियासतों को जोड़कर हिमाचल बना तो दिया गया, लेकिन इसे ‘केंद्र-शासित प्रदेश’ का दर्जा मिला। दिल्ली में बैठे नौकरशाहों को लगता था कि पहाड़ के लोग अपना शासन खुद चलाने में सक्षम नहीं हैं। यहां तक कि 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग ने सिफारिश कर दी थी कि हिमाचल का विलय पंजाब में कर दिया जाए।
लेकिन, डॉ. यशवंत सिंह परमार (जिन्हें हिमाचल का निर्माता कहा जाता है) अड़ गए। उनका तर्क साफ था कि पहाड़ की संस्कृति, पहाड़ की समस्याएं और पहाड़ का विकास मैदानी इलाकों से अलग है।
सालों के संघर्ष और ‘विशाल हिमाचल’ के आंदोलन के बाद 25 जनवरी 1971 का वह दिन ऐतिहासिक बन गया। हिमाचल प्रदेश देश का 18वां राज्य बना। यह जम्मू-कश्मीर के बाद भारत का दूसरा पहाड़ी राज्य था, जिसने साबित किया कि छोटे राज्य भी विकास का मॉडल बन सकते हैं।
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