नई दिल्ली, 1 फरवरी (khabarwala24)। पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने केंद्रीय बजट 2026-27 पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराई है। उन्होंने बजट को जनता की आकांक्षाओं से परे बताया है। उन्होंने कहा कि हर बजट-पूर्व टिप्पणीकार और लेखक तथा अर्थशास्त्र के छात्र आज संसद में वित्त मंत्री के भाषण को सुनकर अवश्य ही स्तब्ध रह गए होंगे।
उन्होंने कहा, “मैं मानता हूं कि बजट केवल वार्षिक राजस्व और व्यय का बयान भर नहीं होता। मौजूदा परिस्थितियों में बजट भाषण को उन प्रमुख चुनौतियों पर एक स्पष्ट दृष्टिकोण पेश करना चाहिए, जिनका जिक्र कुछ दिन पहले जारी किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में किया गया था। मुझे संदेह है कि सरकार और वित्त मंत्री ने आर्थिक सर्वेक्षण पढ़ा भी है या नहीं। अगर उन्होंने पढ़ा है, तो ऐसा लगता है कि उन्होंने उसे पूरी तरह से दरकिनार करने का फैसला कर लिया है और अपने पसंदीदा शौक, लोगों पर शब्दों की बौछार करने, पर लौट आए।”
उन्होंने कहा कि मैं कम से कम 10 ऐसी चुनौतियां गिना सकता हूं, जिन्हें आर्थिक सर्वेक्षण और कई जानकार विशेषज्ञों ने चिन्हित किया है। जैसे कि संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा लगाए गए दंडात्मक टैरिफ, जिन्होंने निर्माताओं, विशेष रूप से निर्यातकों, के लिए दबाव पैदा किया है।
लंबे समय से चले आ रहे व्यापारिक संघर्ष, जो निवेश पर बोझ डालेंगे।
बढ़ता हुआ व्यापार घाटा, विशेष रूप से चीन के साथ।
सकल स्थिर पूंजी निर्माण (लगभग 30 प्रतिशत) का कम स्तर और निजी क्षेत्र की निवेश करने में हिचकिचाहट।
भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के प्रवाह को लेकर अनिश्चित दृष्टिकोण और पिछले कई महीनों से विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) का लगातार बाहर जाना।
राजकोषीय समेकन की बेहद धीमी गति और एफआरबीएम के विपरीत लगातार ऊंचा राजकोषीय घाटा और राजस्व घाटा।
आधिकारिक रूप से घोषित मुद्रास्फीति के आंकड़ों और घरेलू खर्च।
शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन के वास्तविक बिलों के बीच लगातार बना रहने वाला अंतर।
लाखों एमएसएमई का बंद होना और बचे हुए का अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष।
रोजगार की अस्थिर स्थिति, विशेष रूप से युवाओं में बेरोजगारी।
बढ़ता शहरीकरण और शहरी क्षेत्रों (नगरपालिकाओं और नगर निगमों) में बिगड़ता बुनियादी ढांचा।
कांग्रेस नेता ने कहा कि इनमें से किसी भी मुद्दे को वित्त मंत्री के भाषण में संबोधित नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि एक अकाउंटेंट के मानकों से भी देखें तो 2025-26 में वित्त प्रबंधन का यह एक बेहद खराब लेखा-जोखा था। राजस्व प्राप्तियां 78,086 करोड़ रुपए कम रहीं, कुल व्यय 1,00,503 करोड़ रुपए कम रहा। राजस्व व्यय 75,168 करोड़ रुपए कम रहा और पूंजीगत व्यय में 1,44,376 करोड़ रुपए की कटौती की गई (केंद्र 25,335 करोड़ रुपए और राज्य 1,19,041 करोड़ रुपए)। इस दयनीय प्रदर्शन की व्याख्या करने के लिए एक शब्द तक नहीं कहा गया। वास्तव में, केंद्र का पूंजीगत व्यय 2024-25 में जीडीपी के 3.2 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में 3.1 प्रतिशत रह गया है।
उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण सेक्टर्स और कार्यक्रमों में धनराशि में कटौती की गई है। बहुप्रचारित जल जीवन मिशन पर किया गया व्यय निर्दयतापूर्वक 67,000 करोड़ रुपए से घटाकर मात्र 17,000 करोड़ रुपए कर दिया गया। कई महीनों तक चले अभ्यास के बाद, राजकोषीय घाटे (एफडी) का संशोधित अनुमान (आरई) बजट अनुमान (बीई) के अनुरूप 4.4 प्रतिशत पर ही टिका रहा है, और 2026-27 के लिए यह अनुमान है कि एफडी जीडीपी के मात्र 0.1 प्रतिशत तक ही घटेगा। राजस्व घाटा 1.5 प्रतिशत पर स्थिर रहेगा। यह निश्चित रूप से वित्तीय अनुशासन और समेकन की दिशा में कोई साहसिक अभ्यास नहीं है।
उन्होंने कहा कि बजट भाषण की सबसे गंभीर आलोचना यह है कि वित्त मंत्री योजनाओं, कार्यक्रमों, मिशनों, संस्थानों, इनिशिएटिव, फंडों, समितियों, हब्स आदि की संख्या बढ़ाते जाने से थकते नहीं हैं। मैंने कम से कम 24 की गिनती की है। मैं आपकी कल्पना पर छोड़ता हूं कि इनमें से कितने अगले साल तक भुला दिए जाएंगे और गायब हो जाएंगे।
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