तिरुवनंतपुरम, 16 फरवरी (khabarwala24)। सबरीमला में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश से जुड़े फैसले की समीक्षा पर सुप्रीम कोर्ट में दोबारा सुनवाई शुरू होने से पहले केरल की विजयन सरकार ने सतर्क रुख अपनाया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह सभी पहलुओं पर विचार-विमर्श के बाद ही अपना अंतिम पक्ष तय करेगी।
राज्य के कानून मंत्री पी. राजीव ने कहा कि इस मुद्दे को “हां या ना” में सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसे जटिल संवैधानिक प्रश्नों से जुड़ा विषय बताते हुए कहा कि सरकार गहन विचार के बाद ही अपना रुख स्पष्ट करेगी।
मंत्री ने याद दिलाया कि सरकार का पूर्व रुख सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले के अनुरूप था। उन्होंने कहा कि आस्था और सामाजिक सुधार साथ-साथ चलने चाहिए- यही दृष्टिकोण सरकार ने अपने हलफनामे में भी अपनाया था।
सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ 7 अप्रैल से सबरीमला समीक्षा मामले में सुनवाई शुरू करेगी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने 2018 के उस फैसले के खिलाफ दायर समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई के लिए विस्तृत कार्यक्रम तय किया है। अदालत ने सभी पक्षों को 14 मार्च तक अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया है और 22 अप्रैल तक बहस पूरी करने का लक्ष्य रखा है।
सितंबर 2018 के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमला स्थित भगवान अयप्पा मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी।
सुनवाई से पहले केरल की प्रभावशाली सामुदायिक संस्थाओं ने राज्य सरकार पर अपना रुख बदलने का दबाव बढ़ा दिया है।
नायर सेवा सोसायटी (एनएसएस) ने सरकार से सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश का विरोध करने की मांग की है।
एनएसएस के महासचिव जी. सुकुमारन नायर ने कहा कि राज्य सरकार और देवस्वोम बोर्ड को अपने पहले के समर्थन वाले रुख में संशोधन करना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस मुद्दे को चुनावी राजनीति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए और सबरीमला में वर्तमान पारंपरिक व्यवस्था को बनाए रखा जाए। साथ ही उन्होंने नामजप आंदोलन से जुड़े मामलों को वापस लेने की भी मांग की।
इसी तरह, श्री नारायण धर्म परिपालन योगम (एसएनडीपी योगम) ने भी सरकार से अपना रुख बदलने की अपील की है।
एसएनडीपी के महासचिव वेल्लापल्ली नटेशन ने कहा कि सरकार को “जो सुधार आवश्यक हो, उसे सुधारना चाहिए” और महिलाओं के प्रवेश का विरोध करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सबरीमला की परंपराओं में बदलाव नहीं होना चाहिए और सरकार को सभी पक्षों को सुनकर निर्णय लेना चाहिए।
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