मुंबई, 29 जनवरी (khabarwala24)। महाराष्ट्र के बारामती में 28 जनवरी को हुए दुखद विमान हादसे ने न केवल राजनीतिक जगत को हिलाकर रख दिया, बल्कि कई परिवारों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। दुखद विमान हादसे में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार सहित पांच लोगों की मौत हो गई, जिनमें फ्लाइट अटेंडेंट पिंकी माली भी शामिल थीं। पिंकी माली के पिता शिवकुमार माली ने गुरुवार को khabarwala24 से बात करते हुए अपना दर्द बयां किया। उन्होंने इस बात पर गहरा दुख जताया कि बेटी की कंपनी ने उन्हें एक बार भी सूचित नहीं किया।
पिंकी माली के पिता शिवकुमार माली ने बताया कि हादसे के बाद कंपनी एमजीआर वेंचर्स (जिसके तहत विमान संचालित था) ने उन्हें एक बार भी संपर्क नहीं किया। परिवार को टीवी पर खबर देखकर पता चला कि उनकी बेटी इस दुनिया में नहीं रही।
शिवकुमार ने कहा, “परसों मेरी बेटी से बात हुई थी। उसने बताया कि वो अजित दादा के साथ बारामती जा रही है, उसके बाद नांदेड़ जाएगी और होटल पहुंचकर कॉल करेगी, लेकिन बीच में यह दुखद घटना हो गई।”
उन्होंने कहा कि बारामती विमान हादसे में उपमुख्यमंत्री अजित पवार के साथ उनकी बेटी का भी देहांत हो गया, लेकिन जिस कंपनी के लिए उनकी बेटी काम कर रही थी, उसी कंपनी ने उन्हें एक बार भी फोन करना जरूरी नहीं समझा। यहां तक कि जब परिवार बारामती पहुंचा, तब भी कोई समन्वय नहीं था, कोई अधिकारी या कंपनी प्रतिनिधि मौजूद नहीं था। उन्हें टीवी पर देखकर पता चला कि उनकी बेटी इस दुनिया में नहीं रही। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि अमानवीय व्यवहार है। किसी भी हादसे में सबसे पहली जिम्मेदारी संबंधित कंपनी की होती है कि वह पीड़ित परिवार को सूचना दे, उन्हें भरोसा दिलाए और हर संभव मदद के लिए आगे आए, लेकिन यहां ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।
पिता ने कहा, “मुझे कंपनी पर गुस्सा है। मैं अपने दोस्तों के माध्यम से वहां पर पहुंचा। अगर आज मेरी जगह कोई और होता तो बारामती जाना, उतना खर्चा करना और वहां से शव को वापस लाना, न कोई एंबुलेंस का पता, न कोई समन्वय रहा। कंपनी ने हमें कोई सूचना नहीं दी। इसकी जांच होनी चाहिए। मुंबई से बारामती की दूरी करीब 250 किमी से अधिक है। ये एक हाईस्पीड फ्लाइट थी। लैंडिंग के टाइम एक्सीडेंट क्यों हुआ। इसकी जांच करनी चाहिए।
उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि मेरी बेटी का निधन किस कारण हुआ, उसके कारण मुझे पता होना चाहिए। मां-बाप का फर्ज बच्चों को पढ़ाना होता है। 1989 में दिल्ली के अंदर मैं नौकरी करता था, उस समय मेरी नौकरी छूट गई थी। मैंने अपना संघर्ष अपनी बेटी को बताता था। बेटी सालों की ट्रेनिंग और प्रमोशन के बाद यहां तक पहुंची थी।
पिंकी के पति सोमविकर सैनी ने भी शांत लेकिन दर्द भरे लहजे में कहा कि उन्हें आर्थिक मदद की नहीं, बल्कि सिर्फ मानवीय संवेदना की उम्मीद थी। हादसे के इतने दिनों बाद भी कंपनी से कोई फोन, संदेश या प्रतिनिधि नहीं आया। परिवार को खुद बारामती पहुंचना पड़ा, जहां कोई समन्वय नहीं था। कोई अधिकारी या कंपनी का व्यक्ति मौजूद नहीं था। परिवार को शव ले जाने, एंबुलेंस आदि की व्यवस्था खुद करनी पड़ी।
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