नई दिल्ली, 28 फरवरी (khabarwala24)। भारतीय योग परंपरा को 20वीं सदी में नया जीवन और वैश्विक पहचान दिलाने में तिरुमलाई कृष्णमाचार्य का बड़ा योगदान रहा है। उन्हें व्यापक रूप से आधुनिक योग का जनक कहा जाता है। योग के शास्त्रीय ज्ञान, आयुर्वेद की समझ और व्यक्तिगत शिक्षण पद्धति के कारण उन्होंने योग को केवल साधना नहीं, बल्कि जीवन पद्धति के रूप में स्थापित किया।
कृष्णमाचार्य का जन्म 18 नवंबर 1888 को कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले के मुचुकुंडपुरा गांव में एक अयंगर ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता वेदों के विद्वान थे और बाल्यावस्था से ही उन्होंने उन्हें संस्कृत, वेद और शास्त्रों की शिक्षा दी।
कम उम्र में ही उन्होंने षड्दर्शन-वैशेषिक, न्याय, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदांत का अध्ययन किया। उन्होंने वाराणसी और पटना जैसे शिक्षा केंद्रों में तर्कशास्त्र, व्याकरण और वेदांत की पढ़ाई की। आयुर्वेद का भी गहन अध्ययन किया, जिसने आगे चलकर उनकी योग-चिकित्सा पद्धति को मजबूत आधार दिया।
कृष्णमाचार्य ने दावा किया कि उन्होंने हिमालय में गुरु योगेश्वर राममोहन ब्रह्मचारी से दीर्घकाल तक योग की शिक्षा प्राप्त की। वहीं, उन्होंने पतंजलि के योगसूत्र, आसन, प्राणायाम, और योग के चिकित्सीय पहलुओं का गहन अभ्यास किया। गुरु के आदेशानुसार, उन्होंने गृहस्थ जीवन अपनाया और योग के प्रसार को अपना जीवनधर्म बनाया।
1920 और ’30 के दशक में मैसूर के महाराजा कृष्णराज वाडियार चतुर्थ के संरक्षण में कृष्णमाचार्य ने योग को नई दिशा दी। उन्होंने मैसूर पैलेस में योगशाला स्थापित की और सार्वजनिक प्रदर्शन, व्याख्यान, तथा पुस्तकों के माध्यम से योग का व्यापक प्रचार किया।
उनकी पुस्तक ‘योग मकरंद’ (1934) आधुनिक योग साहित्य की महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है। उन्होंने श्वास और गति के संयोजन पर आधारित विन्यास पद्धति को विकसित किया, जिसने आगे चलकर विश्वभर में लोकप्रियता पाई।
कृष्णमाचार्य के कई शिष्य आगे चलकर विश्व प्रसिद्ध योगाचार्य बने, जिनमें इंद्रा देवी, के. पट्टाभि जोइस, बीकेएस अयंगर, टीकेवी देसीकाचार और एजी मोहन शामिल हैं। इन शिष्यों ने आगे चलकर अष्टांग योग, अयंगर योग और विनीयोग जैसी प्रमुख शैलियों को विकसित किया। इस प्रकार, आज विश्व में प्रचलित अधिकांश आधुनिक योग परंपराओं की जड़ें कहीं न कहीं कृष्णमाचार्य तक पहुंचती हैं।
भारत में कृष्णमाचार्य को केवल योगी ही नहीं, बल्कि एक कुशल चिकित्सक के रूप में भी जाना जाता था। उन्होंने आयुर्वेद और योग को मिलाकर अनेक रोगियों का उपचार किया। उनके अनुसार योग केवल शरीर को लचीला बनाने की क्रिया नहीं, बल्कि मन, प्राण और चेतना के संतुलन का विज्ञान है।
कृष्णमाचार्य आयुर्वेद के चिकित्सक थे। उन्हें पोषण, जड़ी-बूटियों, तेलों के उपयोग और अन्य उपचारों का व्यापक ज्ञान था। प्रारंभिक जांच के दौरान या उसके बाद, कृष्णमाचार्य रोगी से पूछते थे कि क्या वह उनके मार्गदर्शन का पालन करने को तैयार है। उनके अनुसार, यह प्रश्न उपचार के लिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि उनका मानना था कि यदि व्यक्ति उन पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर सकता, तो उसके ठीक होने की संभावना बहुत कम होती है।
कृष्णमाचार्य ने कभी भारत नहीं छोड़ा, फिर भी उनका प्रभाव पूरी दुनिया में फैला। आज यदि योग विश्वव्यापी आंदोलन बना है, तो उसमें उनका योगदान केंद्रीय है।
उनकी शिक्षाओं ने योग को शारीरिक व्यायाम से आगे बढ़ाकर जीवनशैली बनाया, उसे व्यक्तिगत आवश्यकता के अनुसार अनुकूलित किया, चिकित्सा और स्वास्थ्य से जोड़ा और वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य बनाया।
उन्हें योग में उनके योगदान और आयुर्वेदिक पद्धति से उपचार के लिए याद किया जाता है। 28 फरवरी 1989 को तिरुमलाई कृष्णमाचार्य का चेन्नई में निधन हो गया। निधन के समय उनकी आयु 100 वर्ष थी। रिपोर्टों के मुताबिक, उनका निधन प्राकृतिक कारणों से हुआ। योग के माध्यम से उन्होंने स्वयं को जीवनभर स्वस्थ बनाए रखा।
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