नई दिल्ली, 5 सितंबर (khabarwala24)। घराना शब्द घर से निकला है, जिसका अर्थ निवास या परिवार होता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत को बुलंदियों पर पहुंचाने का श्रेय घरानों को जाता है, जिनकी वजह से शास्त्रीय संगीत ने न केवल भारत में बल्कि सात समुंदर पार भी खास मुकाम हासिल किया है। ऐसा ही एक घराना मैहर है, जिसकी नींव भारतीय संगीत के भीष्म पितामह कहे जाने वाले उस्ताद अलाउद्दीन खां ने रखी थी।
भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक महान सरोद वादक, संगीतकार और शिक्षक उस्ताद अलाउद्दीन खां किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। संगीत पर उनकी पकड़ का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मैहर घराने ने बंदूकों से बारूद की जगह संगीत की अनूठी कला को जन्म दिया, जिसने भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
साल 1862 को पैदा हुए अलाउद्दीन खां का परिवार संगीतमय पृष्ठभूमि से था। बताया जाता है कि उन्होंने बचपन से ही संगीत सीखना शुरू कर दिया था। संगीत परिवार से ताल्लुक होने के कारण उन्होंने अपने बड़े भाई फकीर आफताबुद्दीन खां से संगीत की पहली शिक्षा ली। इसके बाद उन्होंने कई गुरुओं से संगीत की शिक्षा ली। संगीत के प्रति बढ़ती रुचि ने उस्ताद अलाउद्दीन खां को रामपुर पहुंचाया, जहां उन्होंने मशहूर वीणावादक वजीर खां साहब से संगीत की शिक्षा प्राप्त की।
संगीत के प्रति प्रेम ने अलाउद्दीन खां को मैहर घराना की स्थापना के लिए प्रेरित किया। इस घराने में सरोद, सितार और अन्य वाद्ययंत्रों के साथ-साथ ध्रुपद और ख्याल गायन का समन्वय दिखाई देता है। उस्ताद ने रागों की शुद्धता और तकनीकी कौशल पर विशेष ध्यान दिया, जिसने मैहर घराने को और भी खास बनाया।
वे एक कुशल सरोद वादक होने के साथ-साथ वायलिन, सितार और कई अन्य वाद्ययंत्रों में भी निपुण थे। उन्होंने कई रागों की रचना की और भारतीय संगीत को समृद्ध किया। वे मैहर में राजा भानु प्रताप सिंह के दरबार में संगीतज्ञ थे, जहां उन्होंने अपनी कला को निखारा।
अलाउद्दीन खां एक महान गुरु थे, जिन्होंने कई प्रसिद्ध शिष्यों को प्रशिक्षित किया, जिनमें उनके पुत्र उस्ताद अली अकबर खां (सरोद वादक), उनकी पुत्री अन्नपूर्णा देवी (सुरबहार वादक), पंडित रविशंकर (सितार वादक) और पंडित निखिल बनर्जी (सितार वादक) शामिल हैं।
पद्म भूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्म विभूषण से सम्मानित उस्ताद अलाउद्दीन खां के मैहर घराने ने ही बारूद की जगह बंदूकों से संगीत निकालने की अनोखी कला को विकसित किया था। मशहूर फिल्मकार संजय काक ने उस्ताद अलाउद्दीन खां पर एक डाक्यूमेंट्री भी बनाई, जिसे देखकर हर कोई उनकी कला का कायल हो गया।
संगीत के प्रति अपनी गहरी लगन के साथ-साथ उस्ताद अलाउद्दीन खां का दूसरा प्रेम उनकी पत्नी बेगम मदीना थीं। उनका यह प्रेम इतना गहरा था कि उन्होंने अपनी पत्नी के नाम पर एक नया राग, मदनमंजरी रचा। बताया जाता है कि शुरुआत में उन्हें इस राग का नाम तय करने में कठिनाई हुई, लेकिन काफी विचार के बाद उन्होंने इसे मदनमंजरी नाम दिया। अलाउद्दीन खां ने 6 सितंबर 1972 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
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Source : IANS
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