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वेद प्रकाश शर्मा: साहित्य जगत का ‘सबसे बड़ा खिलाड़ी’, ऐसे आया था ‘वर्दी वाला गुंडा’ लिखने का विचार

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नई दिल्ली, 16 फरवरी (khabarwala24)। हिंदी साहित्य जगत में एक से बढ़कर एक कलमकार हुए, जिन्होंने अपनी लेखनी का जादू अपनी रचनाओं में दिखाया। ऐसे ही शब्दों के जादूगर थे वेद प्रकाश शर्मा, जिन्होंने अपने उपन्यासों के जरिए जासूसी-थ्रिलर विधा को मुख्यधारा में लाकर पाठकों का न केवल मनोरंजन किया बल्कि आम आदमी को पढ़ने की भी लत डाली।

17 फरवरी को हिंदी पल्प फिक्शन के लेखक और ‘सस्पेंस के बादशाह’ के नाम से मशहूर वेद प्रकाश शर्मा की पुण्यतिथि है।

10 जून 1955 को उत्तर प्रदेश के मेरठ में जन्मे वेद प्रकाश ने 1980-90 के दशक में हिंदी जासूसी-रोमांच साहित्य को लोकप्रियता की नई बुलंदियां दीं। उन्होंने 170 से ज्यादा उपन्यास लिखे, जिनमें से अधिकांश बेहद लोकप्रिय हुए और लाखों प्रतियां बिकीं। उनकी खासियत थी कि उनकी भाषा आम बोलचाल की थी, जो हर वर्ग के पाठक तक आसानी से पहुंचती थी।

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वह अक्सर कहते थे कि वे अखबारों की खबरों और रोजमर्रा की घटनाओं से प्रेरणा लेकर कहानियां लिखते हैं। उनकी सबसे प्रसिद्ध किताब ‘वर्दी वाला गुंडा’ का विचार भी इसी तरह आया। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि एक बार वह मेरठ के बेगमपुल इलाके में घूम रहे थे। तभी उनकी नजर एक पुलिस अधिकारी (दारोगा) पर पड़ी, जो कुछ लोगों पर बेरहमी से डंडे बरसा रहा था। वह इतनी क्रूरता से मार रहा था जैसे कोई असली गुंडा हो, न कि वर्दीधारी पुलिसवाला। इस घटना ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया और दिमाग में सवाल उठा कि वर्दी पहनकर भी कोई गुंडा बन सकता है। इसी अनुभव से ‘वर्दी वाला गुंडा’ का कॉन्सेप्ट जन्मा।

साल 1993 में प्रकाशित इस उपन्यास की पहले ही दिन करीब 15 लाख प्रतियां बिक गईं, जो उस समय के लिए एक अनोखा रिकॉर्ड था। वेद प्रकाश शर्मा के अन्य मशहूर उपन्यासों में ‘बहू मांगे इंसाफ’, ‘साढ़े तीन घंटे’, ‘कैदी नंबर 100’, ‘कारीगर’, ‘हत्या एक सुहागिन की’, ‘दौलत पर टपका खून’ आदि शामिल हैं।

उनकी कहानियां जासूसी, हत्या, रहस्य, रोमांच, प्रेम, धोखा, विश्वासघात और सामाजिक मुद्दों से भरी होती थीं। पाठकों में इन किताबों के लिए जबरदस्त दीवानगी थी। मोटी-मोटी किताबें 2-4 दिनों में खत्म हो जाती थीं और नई सीरीज का बेसब्री से इंतजार रहता था। यहां तक कि कई लोग किराए पर लेकर पढ़ते थे।

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उनकी रचनाएं किताबों तक सीमित नहीं रहीं। कई उपन्यासों पर फिल्में और टीवी सीरीज बनीं। उनके उपन्यास ‘सबसे बड़ा खिलाड़ी’ पर ‘खिलाड़ी’ बनी, जिसमें अक्षय कुमार ने ‘लल्लू’ का किरदार निभाया था। ‘इंटरनेशनल खिलाड़ी’ का स्क्रीनप्ले भी वेद प्रकाश ने लिखा। ‘बहू मांगे इंसाफ’ पर 1985 में फिल्म बनी, जबकि उनके कैरेक्टर ‘केशव पंडित’ पर 2010 में जी टीवी पर सीरीज आई। आमिर खान ने मेरठ में उनसे मिलकर एक फिल्म के लिए स्क्रिप्ट लिखने का अनुरोध किया था, जिस पर वह काम कर रहे थे।

वेद प्रकाश को साल 1995 और 2003 में मेरठ रत्न और नटराज भूषण जैसे सम्मान मिले। लंबी बीमारी से जूझते हुए उन्होंने 17 फरवरी 2017 को मेरठ में अंतिम सांस ली। उनके जाने के बाद भी उनकी किताबें आज भी बाजार में बिकती हैं और नई पीढ़ी को रोमांचित करती रहती हैं।

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