‘वतन’ वाले कवि प्रदीप: जिनके गीत पढ़ते ही रो पड़े लता मंगेशकर-पूर्व पीएम, ब्रिटिश सरकार ने लगाया था प्रतिबंध

-Advertisement-
Join whatsapp channel Join Now
Join Telegram Group Join Now
-Advertisement-

मुंबई, 5 फरवरी (khabarwala24)। ऐ मेरे वतन के लोगों… गीत की रचना करने वाले कवि की कलम में वह जादू था जो पूर्व प्रधानमंत्री से लेकर लता मंगेशकर तक की आंखें नम कर गया। आज सालों बाद भी उनके गीत पुराने नहीं हुए, वही देशभक्ति के रस, वही मिठास और जोश-जज्बों से भरे एक-एक शब्द और गीतकार कवि प्रदीप (रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी) भी प्रशंसकों के दिलों में खास जगह रखते हैं।

6 फरवरी 1915 को मध्य प्रदेश के छोटे से शहर बड़नगर में जन्मे गीतकार और कवि प्रदीप की शुक्रवार को जयंती है। उन्हें देश का सबसे भावुक देशभक्ति गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ लिखने के लिए याद किया जाता है। यह गीत साल 1962 के भारत-चीन युद्ध में शहीद सैनिकों की याद में लिखा गया था और आज भी हर भारतीय के दिल में गूंजता है।

लखनऊ विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी करने के बाद वह अपनी साहित्यिक महत्वाकांक्षाओं के साथ मुंबई आए। फिल्मी दुनिया में नाम छोटा रखने के लिए उन्होंने कवि प्रदीप नाम अपनाया। किस्मत ने साथ दिया और साल 1939 में एक कवि सम्मेलन में उनकी प्रतिभा देखकर बॉम्बे टॉकीज ने उन्हें 200 रुपए मासिक वेतन पर रखा। यहीं से उनकी छह दशक लंबी रचनात्मक यात्रा शुरू हुई।

- Advertisement -

उन्होंने 71 फिल्मों के लिए लगभग 1700 गीत लिखे। उनके कई गीत देशभक्ति से भरे थे। साल 1940 में आई फिल्म ‘बंधन’ का गाना चल चल रे नौजवान इतना जोशीला था कि ब्रिटिश सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया। 1943 में फिल्म ‘किस्मत’ के गीतों की वजह से उन्हें भूमिगत होना पड़ा। उनकी कलम को ब्रिटिश प्रशासन ने बड़ा खतरा माना।

‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ तो आज भी उसी सम्मान और भावनाओं के साथ गाया जाता है। हालांकि, इस गीत की कहानी बहुत भावुक है। जब कवि प्रदीप ने लता मंगेशकर को गीत सुनाया, तो लता भावुक होकर रो पड़ी थीं। उन्होंने तुरंत गाने के लिए हामी भरी, लेकिन शर्त रखी कि रिहर्सल में प्रदीप मौजूद रहेंगे। लता ने सुझाव दिया कि इसे ड्यूएट में गाया जाए, जिसमें आशा भोसले भी हों। रिहर्सल में दोनों बहनों ने मिलकर गाया, लेकिन दिल्ली जाने से पहले आशा ने हिस्सा छोड़ दिया। अंत में लता ने अकेले इस गाया।

26 जनवरी 1963 को गणतंत्र दिवस पर नेशनल स्टेडियम में लता मंगेशकर ने यह गीत गाया। स्टेडियम में उस वक्त 50 हजार से ज्यादा लोग मौजूद थे। मंच पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन थे। गाना शुरू होते ही पूरा स्टेडियम शांत हो गया। हर आंख नम हो गई। नेहरू की आंखों से आंसू बहने लगे। गीत खत्म होने पर नेहरू ने कहा था, “जो इस गाने से प्रेरित नहीं हो सकता, मेरे ख्याल से वो हिंदुस्तानी नहीं है।”

- Advertisement -

कवि प्रदीप को भारत सरकार से साल 1997 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार मिला, लेकिन तब उनका व्यक्तिगत जीवन बहुत दुखद था। पत्नी के निधन के बाद वे लकवाग्रस्त हो गए। उनकी चार संतानों ने उन्हें अकेला छोड़ दिया। कोलकाता के एक व्यवसायी प्रदीप कुंडलिया ने उन्हें अपने घर में जगह दी और देखभाल की।

11 दिसंबर 1998 को 83 साल की उम्र में कवि प्रदीप का निधन हुआ। उनकी याद में 2011 में डाक टिकट जारी किया गया और ‘राष्ट्रीय कवि प्रदीप सम्मान’ शुरू किया गया।

Breaking News in Hindi और Latest News in Hindi सबसे पहले मिलेगी आपको सिर्फ Khabarwala24 पर. Hindi News और India News in Hindi  से जुड़े अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें Facebook पर ज्वॉइन करें, Twitter पर फॉलो करें और Youtube Channel सब्सक्राइब करे।

- Advertisement -
spot_img

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

-Advertisement-

Related News

-Advertisement-

Breaking News

-Advertisement-