श्री वराह लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी मंदिर: दो स्वरूपों में विराजमान हैं भगवान विष्णु, जानें क्यों साल भर लगा रहता है चंदन का लेप?

नई दिल्ली, 11 दिसंबर (khabarwala24)। भगवान विष्णु ने समय-समय पर पृथ्वी को बचाने और राक्षसों का संहार करने के लिए अलग-अलग अवतार लिए हैं। आइए भगवान विष्णु के वराह और नरसिंह अवतार के बारे में जानते हैं।दोनों रूपों में भगवान विष्णु के अलग-अलग मंदिर भारत के अलग-अलग कोनों में मौजूद हैं, लेकिन विशाखापत्तनम में एक […]

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नई दिल्ली, 11 दिसंबर (khabarwala24)। भगवान विष्णु ने समय-समय पर पृथ्वी को बचाने और राक्षसों का संहार करने के लिए अलग-अलग अवतार लिए हैं। आइए भगवान विष्णु के वराह और नरसिंह अवतार के बारे में जानते हैं।

दोनों रूपों में भगवान विष्णु के अलग-अलग मंदिर भारत के अलग-अलग कोनों में मौजूद हैं, लेकिन विशाखापत्तनम में एक ऐसा मंदिर है, जहां भगवान विष्णु के संयुक्त रूप की पूजा होती है।

श्री वराह लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में सिम्हाचलम पहाड़ी पर समुद्र तल से 800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है, जिनके यहां वराह और नरसिंह अवतार की संयुक्त रूप से पूजा की जाती है। मंदिर में प्रतिमा को साल भर चंदन के लेप से ढका जाता है और सिर्फ अक्षय तृतीया के दिन ही उनका पूरा रूप देखने को मिलता है। साल के बाकी दिन चंदन के लेप से ढके होने की वजह से प्रतिमा शिवलिंग के समान दिखती है। भगवान के बिना चंदन के रूप को ‘निजरूप दर्शन’ कहा जाता है, जिसके दर्शन साल में सिर्फ एक बार हो पाते हैं।

प्रतिमा को चंदन के लेप से इसलिए ढका जाता है, क्योंकि भगवान का वराह और नरसिंह अवतार उग्र और भयंकर ऊर्जा से भरा है। उनकी ऊर्जा को संतुलित करने के लिए प्रतिमा पर रोजाना चंदन का लेप लगाया जाता है, जिससे भगवान को शीतलता मिले और वे शांत रूप में भक्तों को दर्शन दे सकें। प्रतिमा पर चंदन लगाने की प्रथा काफी सालों से चली आ रही है।

भगवान विष्णु के इन दोनों ही रूपों की अलग-अलग पौराणिक कथा मौजूद हैं। भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए नरसिम्हा का अवतार लेकर राक्षस हिरण्यकशिपु का वध किया था, जबकि वराह अवतार लेकर भगवान विष्णु ने राक्षस हिरण्याक्ष को मारा था और मां पृथ्वी को बचाया था।

मंदिर के निर्माण को लेकर कई तरह की बातें की जाती हैं। माना जाता है कि 11वीं सदी में राजा श्री कृष्णदेवराय ने मंदिर का निर्माण करवाया था, लेकिन मंदिर के इतिहास में 13वीं सदी में पूर्वी गंग वंश के नरसिंह प्रथम का योगदान भी देखने को मिलता है। मंदिर की नक्काशी और गोपुरम दोनों सदी की शैली को दिखाते हैं। बढ़ते समय के साथ मंदिर अलग-अलग राज्यों के संरक्षण में रहा और धीरे-धीरे मंदिर का निर्माण बढ़ता गया। मंदिर में जयस्तंभ भी स्थापित है, जिसे कलिंग के राजा कृष्णदेवराय ने युद्ध के दौरान बनवाया था। मंदिर आध्यात्मिकता के साथ-साथ सांस्कृतिक शैली और अलग-अलग युगों के संरक्षण का प्रमाण देता है। यह मंदिर पर्यटन की दृष्टि से भी खास है। भक्त भगवान के अद्भुत दो रूपों को देखने के लिए आते हैं।

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