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क्रांति के युवा स्तंभ : खुदीराम बोस का संघर्ष, हिम्मत और शहादत ने ब्रिटिश सत्ता को दी कड़ी चुनौती

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नई दिल्ली, 2 दिसंबर (khabarwala24)। साल 1908, तारीख 11 अगस्त, समय सुबह के ठीक 6:00 बजे थे और मुजफ्फरपुर जेल के बाहर हजारों लोगों का हुजूम जमा था। हर दिल में एक सवाल था कि क्या वाकई एक किशोर हंसते-हंसते मौत को गले लगाएगा? फांसी के तख्ते की ओर बढ़ते हुए, उस अठारह वर्षीय लड़के के चेहरे पर डर की एक लकीर तक नहीं थी। उसके होंठों पर एक शांत, अविचलित मुस्कान थी और हाथ में थी श्रीमद्भगवद्गीता।

खुदीराम बोस, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का वह सबसे युवा नाम है, जो मात्र 18 वर्ष, 8 महीने की आयु में, ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध जलती मशाल बन गया। उनका जीवन एक व्यक्तिगत त्रासदी से शुरू हुआ, लेकिन एक ऐसी शहादत पर समाप्त हुआ, जिसने पूरे देश में क्रांति की लहर पैदा कर दी।

खुदीराम का जन्म 3 दिसंबर 1889 को बंगाल प्रेसीडेंसी के मिदनापुर में हुआ। बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ जाने के कारण, उनका पालन-पोषण बड़ी बहन ने किया। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता, जिसे नियति ने दी थी, उन्हें पारंपरिक जीवन के बंधनों से मुक्त करके क्रांति के पथ पर ले आई।

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1905 में, लॉर्ड कर्जन के बंगाल विभाजन के फैसले ने देश की आत्मा को झकझोर दिया। इस विभाजन ने भारतीय राष्ट्रवाद को नरमपंथी विचारधारा की राह से हटाकर सशस्त्र प्रतिरोध और उग्र राष्ट्रवाद की ओर मोड़ दिया। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के ‘वन्दे मातरम’ के पवित्र उद्घोष ने खुदीराम जैसे किशोरों की रगों में उबाल भर दिया।

मिदनापुर कॉलेजिएट स्कूल में पढ़ाई के दौरान, वे अपने राजनीतिक गुरु सत्येंद्र नाथ बोस के संपर्क में आए। उनके नेतृत्व में ही खुदीराम ने औपचारिक शिक्षा छोड़कर, ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंकने के संकल्प के साथ गुप्त चरमपंथी समितियों, विशेषकर जुगान्तर और अनुशीलन समिति से नाता जोड़ लिया।

खुदीराम की सक्रियता सार्वजनिक विरोध तक सीमित नहीं रही। केवल 15 वर्ष की आयु में, वे ब्रिटिश विरोधी पर्चे बांटने के आरोप में पहली बार गिरफ्तार हुए, लेकिन अपनी कम उम्र के कारण रिहा कर दिए गए। यह रिहाई ब्रिटिश राज की सबसे बड़ी भूल साबित हुई। रिहा होने के बाद, उनका जोश और उग्र हो गया। उन्होंने रिवोल्यूशनरी पार्टी की सदस्यता ग्रहण की, बम बनाने का प्रशिक्षण लिया और अब उनका ध्यान ‘प्रचार’ से हटकर ‘लक्षित प्रतिशोध’ की ओर केंद्रित हो गया था।

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1907 में गवर्नर के प्रशिक्षु पर बम हमला हो या फिर 1908 में दो अन्य ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या की कोशिश, खुदीराम की निर्भीकता हर कदम पर साबित हुई।

क्रांतिकारियों के निशाने पर था कलकत्ता का प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट डगलस एच किंग्सफोर्ड। किंग्सफोर्ड स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति अपनी क्रूरता के लिए कुख्यात था। क्रांतिकारियों के गुस्से को शांत करने के लिए किंग्सफोर्ड को कलकत्ता से बिहार के मुजफ्फरपुर स्थानांतरित कर दिया गया, लेकिन जुगान्तर समूह ने उसे खत्म करने का फैसला कर लिया। इस मिशन की जिम्मेदारी मिली दो सबसे निडर युवाओं (खुदीराम बोस और उनके साथी प्रफुल्ल चाकी) को।

30 अप्रैल 1908 की शाम, मुजफ्फरपुर में यूरोपियन क्लब के पास, दोनों क्रांतिकारी घात लगाए बैठे थे। शाम लगभग 7:30 बजे, किंग्सफोर्ड की दो गाड़ियां क्लब से बाहर निकलीं। भ्रम की स्थिति में, खुदीराम ने किंग्सफोर्ड की बग्घी समझकर उस पर बम फेंक दिया।

लेकिन, नियति को कुछ और ही मंजूर था। वह गाड़ी बैरिस्टर प्रिंगल कैनेडी की थी, जो कि ब्रिटिश होने के बावजूद स्वतंत्रता संग्राम के प्रति सहानुभूति रखते थे। धमाके में कैनेडी की पत्नी और बेटी की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि क्रूर किंग्सफोर्ड बाल-बाल बच निकला।

इस घटना ने पूरे देश में सनसनी फैला दी थी। ब्रिटिश दमनचक्र तेज हो गया। भाग-दौड़ के दौरान, प्रफुल्ल चाकी ने पुलिस के हाथों पकड़े जाने से पहले अपनी पिस्तौल से खुद को गोली मार ली और शहादत को चुना।

दूसरी ओर, खुदीराम बोस अगली सुबह 25 किलोमीटर पैदल चलकर वैनी रेलवे स्टेशन पहुंचे, जहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 13 जून को, खुदीराम बोस को प्राण दंड की सजा सुनाई गई। अदालत में मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं, सिवाय एक खुदीराम के। उनके चेहरे पर वही शांत मुस्कान थी।

जब न्यायाधीश ने उनसे पूछा कि क्या उन्हें सजा समझ आई है, तो इस बालक ने निर्भीकता से जवाब दिया, “अगर आप मुझे थोड़ा और समय दें, तो मैं आपको भी बम बनाना सिखा दूंगा।” यह ब्रिटिश सत्ता के प्रति उनका तिरस्कार था, एक ऐसा बयान जो जेल की दीवारों से बाहर निकलकर क्रांति का नया उद्घोष बन गया।

खुदीराम की ओर से दायर अपील खारिज कर दी गई और 11 अगस्त 1908 को, उन्हें फांसी दे दी गई। वे हाथ में गीता लेकर, हंसते-हंसते तख्ते पर चढ़ गए। उनका बलिदान एक व्यक्तिगत कृत्य से कहीं अधिक बड़ा, एक राजनीतिक कार्य था, जिसने आने वाली पीढ़ियों के लिए निडरता का मानक स्थापित किया।

उनकी शहादत के बाद, उनकी लोकप्रियता चरम पर पहुंच गई। बंगाल के बुनकरों ने उनका नाम लिखा ‘खुदीराम धोती’ बनाना शुरू कर दिया, जिसे छात्र गर्व से पहनते थे। कवि पीतांबर दास का लिखा गीत, ”एक बार विदाई दो मां, मैं घर आता हूं”, आज भी बंगाल के घरों में गूंजता है। मुंशी प्रेमचंद जैसे साहित्यकार भी उनके चित्र को सम्मानपूर्वक अपने अध्ययन कक्ष की दीवार पर लगाते थे।

Source : IANS

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