Khabarwala24 News Canara Bank e-auction: देश में ई-नीलामी के जरिए संपत्ति खरीदना आजकल आसान और लोकप्रिय हो गया है। लेकिन गुवाहाटी के एक व्यापारी के साथ हुआ वाकया इस सिस्टम की खामियों को उजागर करता है। वैष्णो देवी ट्रेडर्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक बलवान भामा ने केनरा बैंक की एक ई-नीलामी में जमीन खरीदी, लेकिन 6 साल बाद भी न तो उन्हें जमीन का कब्जा मिला और न ही मूल दस्तावेज।
मजबूरन भामा को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी आपबीती दुनिया के सामने रखनी पड़ी। इस मामले में भामा ने बैंक और डिफॉल्टर कर्जदार के बीच मिलीभगत के गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि बैंक और कर्जदार संजीव जायसवाल ने मिलकर उन्हें धोखा दिया, जिससे उन्हें ₹100 करोड़ से ज्यादा का नुकसान हो चुका है।
क्या है पूरा मामला? ₹20 करोड़ क्यों फंसे?
यह मामला 9 सितंबर 2019 का है, जब बलवान भामा ने केनरा बैंक की फैंसी बाजार शाखा, गुवाहाटी द्वारा आयोजित ई-नीलामी में एक भूखंड खरीदा। यह जमीन ब्रह्मपुत्र टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड ने बैंक में लोन के लिए गिरवी रखी थी। जमीन का कुल क्षेत्रफल 2 बीघा, 4 कठा और 16 लेचा था और यह राष्ट्रीय राजमार्ग 37 के पास थी, जो इसे व्यावसायिक दृष्टि से काफी मूल्यवान बनाता था।
भामा की कंपनी ने 24 सितंबर 2019 को पूरा भुगतान कर दिया और 1 अक्टूबर 2019 को बैंक ने बिक्री प्रमाणपत्र (Sale Certificate) भी जारी कर दिया। कानूनन, अब यह जमीन वैष्णो देवी ट्रेडर्स की थी। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह किसी सस्पेंस फिल्म से कम नहीं। छह साल बीत जाने के बाद भी भामा को न तो जमीन का कब्जा मिला और न ही इसके मूल दस्तावेज (original documents)। इतना ही नहीं, उनकी रकम और उसका ब्याज भी बैंक में फंसा हुआ है।
कैसे शुरू हुई धोखाधड़ी?
हरियाणा के हिसार के रहने वाले बलवान भामा का कहना है कि इस मामले में कई स्तरों पर धोखाधड़ी हुई। सबसे पहले, नीलामी से पहले ही कर्जदार ने बैंक के साथ मिलकर डीआरटी (Debt Recovery Tribunal) में एक केस दायर कर नीलामी को चुनौती दी। जब बिक्री प्रमाणपत्र जारी हो गया, तो यह केस कानूनन खत्म हो जाना चाहिए था। लेकिन बैंक ने डीआरटी को इसकी जानकारी नहीं दी। नतीजा यह हुआ कि 3 अक्टूबर 2019 को डीआरटी ने यथास्थिति (status quo) का आदेश दे दिया, जैसे कि जमीन बिकी ही नहीं। यह पूरी तरह से धोखाधड़ी थी, जिसने भामा को जमीन का कब्जा लेने से रोक दिया।
फर्जी दस्तावेज और मिलीभगत का खेल
भामा ने एक और गंभीर आरोप लगाया कि इस मामले में फर्जी बिक्री विलेख (fake sale deed) का इस्तेमाल किया गया। दावा किया गया कि उनके भूखंड और राष्ट्रीय राजमार्ग के बीच तीन कठा की एक और जमीन है, जो असल में कभी थी ही नहीं। इस फर्जी दस्तावेज में तारीख 2007 की थी, लेकिन इसका स्टाम्प पेपर 2010 में छपा था। फोरेंसिक जांच और सरकारी सर्वे ने भी इस दस्तावेज को फर्जी साबित किया। फिर भी, बैंक ने इसे डीआरटी कोर्ट में पेश किया, जिससे इसकी झूठी वैधता बनी और भामा को नुकसान हुआ।
Canara Bank की लापरवाही और अनदेखी
भामा ने बैंक पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं:
मूल दस्तावेज गायब: नीलामी के बाद, बैंक ने सात दिनों के भीतर जमीन के मूल दस्तावेज देने का वादा किया था। लेकिन छह साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी ये दस्तावेज नहीं मिले। इसके बिना, वैष्णो देवी ट्रेडर्स कोई कानूनी कार्रवाई नहीं कर पा रही है।
अधिकारियों का गैर-जिम्मेदाराना रवैया: भामा ने बताया कि उन्होंने गुवाहाटी में जीएम नॉर्थ ईस्ट सर्कल से सैकड़ों बार मुलाकात की। इसके अलावा, वे बैंक के मुख्यालय के छह दौरे कर चुके हैं, लेकिन न तो कोई वरिष्ठ अधिकारी उनसे मिला और न ही उनके पत्रों का जवाब दिया गया।
यथास्थिति का उल्लंघन: डीआरटी के यथास्थिति आदेश के बावजूद, कर्जदार ने जमीन पर दीवारें बदलीं, पुरानी दीवारें तोड़ीं और नया निर्माण शुरू किया। बैंक ने इस गैरकानूनी निर्माण की जानकारी हाई कोर्ट को नहीं दी, जिससे कर्जदार को गलत फायदा मिला।
₹15 करोड़ के लोन डिफॉल्ट पर CBI और ED की चुप्पी
इस मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि ₹15 करोड़ से ज्यादा के लोन डिफॉल्ट के बावजूद, केनरा बैंक ने सीबीआई (CBI) को इसकी जानकारी नहीं दी। भारतीय कानून के अनुसार, ₹5 करोड़ से ज्यादा का डिफॉल्ट होने पर सीबीआई को सूचित करना अनिवार्य है। भामा का आरोप है कि कर्जदार संजीव जायसवाल ने लोन की रकम अपनी दूसरी कंपनियों में लगाई, लेकिन न तो ईडी (Enforcement Directorate) और न ही सीबीआई ने इसकी जांच की। यह सवाल उठाता है कि क्या ताकतवर लोग सिस्टम की खामियों का फायदा उठा रहे हैं, जबकि छोटे और ईमानदार व्यापारियों को परेशानी झेलनी पड़ रही है?
एकमुश्त निपटान: कानून की अनदेखी?
सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि बैंक और कर्जदार अब एकमुश्त निपटान (One-Time Settlement or OTS) की बात कर रहे हैं। इसका मतलब है कि कर्जदार लोन का एक छोटा हिस्सा चुकाएगा और नीलाम हुई जमीन भी अपने पास रख लेगा। यह पूरी तरह से गैरकानूनी है, क्योंकि कानूनन जमीन का मालिक अब वैष्णो देवी ट्रेडर्स है। भामा का कहना है कि इस पूरे मामले ने उन्हें ₹100 करोड़ से ज्यादा का वित्तीय नुकसान पहुंचाया है। उनकी ₹20 करोड़ से ज्यादा की रकम और उसका ब्याज अभी भी बैंक के पास फंसा हुआ है।
ई-नीलामी में पारदर्शिता की कमी
यह मामला ई-नीलामी में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को उजागर करता है। केनरा बैंक जैसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक पर इस तरह के गंभीर आरोप लगना चिंताजनक है। भामा का कहना है कि बैंक ने न केवल उनकी मेहनत की कमाई को खतरे में डाला, बल्कि उनकी कंपनी की साख को भी नुकसान पहुंचाया। इस मामले ने बैंकिंग सिस्टम में विश्वास को हिलाकर रख दिया है।
क्या है भामा की मांग?
बलवान भामा ने अपनी मांगें साफ की हैं:
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जमीन का कब्जा: उन्हें तुरंत जमीन का कब्जा और मूल दस्तावेज दिए जाएं।
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नुकसान की भरपाई: छह साल की कानूनी लड़ाई और ₹100 करोड़ से ज्यादा के नुकसान की भरपाई की जाए।
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जांच की मांग: कर्जदार और बैंक की मिलीभगत की सीबीआई और ईडी से जांच कराई जाए।
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कानूनी कार्रवाई: फर्जी दस्तावेज और यथास्थिति के उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई हो।
ई-नीलामी में सावधानी जरूरी
यह मामला उन लोगों के लिए एक सबक है जो ई-नीलामी के जरिए संपत्ति खरीदने की सोच रहे हैं। भले ही ऑनलाइन नीलामी आसान और पारदर्शी लगती हो, लेकिन इस तरह की घटनाएं सतर्क रहने की जरूरत को दर्शाती हैं। खरीदने से पहले दस्तावेजों की जांच, बैंक की विश्वसनीयता, और कानूनी प्रक्रिया को अच्छी तरह समझना जरूरी है।
केनरा बैंक ई-नीलामी धोखाधड़ी का यह मामला न केवल एक व्यापारी की पीड़ा को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे सिस्टम की खामियां आम लोगों को परेशान करती हैं। बलवान भामा जैसे ईमानदार कारोबारी को छह साल से कोर्ट के चक्कर काटने पड़ रहे हैं, जबकि कर्जदार और बैंक की मिलीभगत से नुकसान बढ़ता जा रहा है। इस मामले ने बैंकिंग सिस्टम, ई-नीलामी की प्रक्रिया, और कानूनी ढांचे पर कई सवाल खड़े किए हैं। अब सवाल यह है कि क्या भामा को इंसाफ मिलेगा? और क्या इस तरह की धोखाधड़ी को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जाएंगे?
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